तोड़कर सब रस्मों की ज़ंजीर को
तोड़कर सब रस्मों की ज़ंजीर को
आज़माये चल ज़रा तक़दीर को।
सौंप दूँ जज़्बात दिल के मैं जिसे,
ढूंढता रहता हूँ दिल की हीर को।
जग की सारी पोथियां पढ़ लो मगर
कौन पढ़ पाया नयन के नीर को।
"रश्मि" सारा ही जहाँ उसका हुआ
जीत ले जो दिल की इस जागीर को।

0 टिप्पणियाँ