नज़रों के वार सारे शरारत में हो गए
नज़रों के वार सारे शरारत में हो गए
दो अजनबी तभी से ही उल्फ़त में हो गए।
थोड़े गिले औ शिकवे मुहब्बत में हो गए
जो रह गए थे बाकी सभी ख़त में हो गए।
है इक नशा गजब ये मुहब्बत ज़रा सुनो,
बर्बाद कितने जाने इसी लत में हो गए।
नादान दिल का रश्मि नहीं है कसूर अब
किस्से वफ़ा के आम तो चाहत में हो गए।
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