ज़िन्दगी ने आज़माया इस क़दर,
रश्मि ममगाईं 
ज़िन्दगी ने आज़माया इस क़दर,
हर सफ़र ने है रुलाया इस क़दर।
भूलना उसको भला मुमकिन कहाँ,
अक्स वो मुझमें नुमाया इस क़दर।
मेरे ज़ख़्मों से मिला उसको सुकूँ,
शख़्स वो तो मुस्कुराया इस क़दर।
रश्मि उससे राब्ता ही क्यूँ रखें,
कर दिया जिसने पराया इस क़दर।
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