कौन झूठा है कौन सच्चा है
कौन झूठा है कौन सच्चा है
ग़ैर है कौन, कौन अपना है।
जाने कैसा ग़ज़ब का जज़्बा है
रोज़ गिरता है रोज़ उठता है।
दिल को ख़ुद से ये कैसा शिक़वा है
बेख़ुदी का अजब ये किस्सा है।
रोकने से रुकेंगे क्यूँ अब हम
मंजिलों पर किया ठिकाना है।
घोंसले भी उदास हैं अब तो
दूर घर से उड़ा परिंदा है।
भूख़ से जो मरे हैं वो बच्चे
छीना किसने कहो निवाला है।
दम नहीं हो उसूलों में जिसके
कोड़ियों में वही तो बिकता है।
बेटियों को उड़ान दे कर अब
आज इतिहास भी बदलना है।
हो गए क्यूँ पराये सब अपने
क्या दिलों पर अहम का पर्दा है।

🌹रश्मि ममगाईं 🌹
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