अब भी आती हैं आवाज़ें पर्वत से उन नदियों से
अब भी आती हैं आवाज़ें पर्वत से उन नदियों से
छूटे घर से, रस्ते से उन ही पुर-सोज़ फ़िज़ाओं से।
नाम हमारा अब भी कोई लेता है गलियारों से
सूख चुके हैं जिनके आंसू उन स्रोतों से झरनों से।
दुनिया भर की ज़ीनत तो झोली में अपनी भर ली पर
कैसे आंख चुराएं बोलो रह रह आती यादों से।
भोलापन भी नादानी भी भूल गए हैं हम सब अब
जोड़ा जब से हमने रिश्ता इन बेजान किताबों से।
इक दिन रश्मी जाना होगा वापिस सबको अपने घर
कब तक दूर रहेंगे पंछी अपने-अपने नीड़ों से।
रश्मि ममगाईं
अब भी आती हैं आवाज़ें पर्वत से उन नदियों से
छूटे घर से, रस्ते से उन ही पुर-सोज़ फ़िज़ाओं से।
नाम हमारा अब भी कोई लेता है गलियारों से
सूख चुके हैं जिनके आंसू उन स्रोतों से झरनों से।
दुनिया भर की ज़ीनत तो झोली में अपनी भर ली पर
कैसे आंख चुराएं बोलो रह रह आती यादों से।
भोलापन भी नादानी भी भूल गए हैं हम सब अब
जोड़ा जब से हमने रिश्ता इन बेजान किताबों से।
इक दिन रश्मी जाना होगा वापिस सबको अपने घर
कब तक दूर रहेंगे पंछी अपने-अपने नीड़ों से।
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