हुए हैं बेख़बर ख़ुद का ठिकाना भूल जाते हैं
हुए हैं बेख़बर ख़ुद का ठिकाना भूल जाते हैं
तुम्हारी याद में हम मुस्कुराना भूल जाते हैं।
न जाने कैसा जादू है तुम्हारा हम पे ए हमदम
तुम्हारे सामने सारा ज़माना भूल जाते हैं।
नहीं अब प्रेम भी सच्चा, हुए रिश्ते भी बेमानी
दिखावा ख़ूब करते हैं निभाना भूल जाते हैं।
किताबी ज्ञान लेकर के कमाते खूब धन दौलत
मगर माँ बाप का वो आशियाना भूल जाते हैं।
ज़माने भर की बातें वो सुनाते हैं हमें अक्सर
मगर वो हाले दिल रश्मी सुनाना भूल जाते हैं।
तुम्हारी याद में हम मुस्कुराना भूल जाते हैं।
न जाने कैसा जादू है तुम्हारा हम पे ए हमदम
तुम्हारे सामने सारा ज़माना भूल जाते हैं।
नहीं अब प्रेम भी सच्चा, हुए रिश्ते भी बेमानी
दिखावा ख़ूब करते हैं निभाना भूल जाते हैं।
किताबी ज्ञान लेकर के कमाते खूब धन दौलत
मगर माँ बाप का वो आशियाना भूल जाते हैं।
ज़माने भर की बातें वो सुनाते हैं हमें अक्सर
मगर वो हाले दिल रश्मी सुनाना भूल जाते हैं।
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