बेवज़ह ही वो मुस्कुराते हैं

बेवज़ह ही वो मुस्कुराते हैं
अश्क़ आँखों के यूँ छिपाते हैं

बेप्रीत का मौसम सुहाना याद है
हसरतों का वो जमाना याद है।

चिलमनों की ओट से ही देख कर
नेह का दीपक जलाना याद है।

क्या हसीं अहसास था वो उस घड़ी
शोख़ नज़रों का निशाना याद है।

मौन का पहला निमंत्रण जब मिला,
नींद रातों की गँवाना याद है।

"रश्मि" जब भी याद आए हैं वो पल
बेवजह ही मुस्कुराना याद है।

🌹रश्मि ममगाईं🌹