उनको क्या फ़िक्र भला देश में मंहगाई की।
उनको क्या फ़िक्र भला देश में मंहगाई की।
उनको तो फ़िक्र है बस कुर्सी की ऊँचाई की।
इस ज़माने से छुपाया था जिसे बरसों से
बात तो सच है मगर बात है रुसवाई की।
वास्ते जिसके भुलाया है जहाँ सारा ये
है ख़बर ही नहीं उसको मेरी तन्हाई की।
बंट गए रिश्ते सभी साथ ही बंटवारे के
भाई ही लूट गया खुशियाँ सभी भाई की।
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