*बिखरते रिश्ते टूटते परिवार*
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*बिखरते रिश्ते टूटते परिवार*
स्व से अति प्रेम और दिलों में अपरिमित रूप से उमड़ती आजादी का भाव तथा नैतिक मूल्यों का ह्रास यही रिश्तों के बिख़राव का मूल कारण है।
रिश्तों के इस बिखराव की शुरुआत बहुत पहले हो गई थी जब हम संयुक्त परिवार से एकल परिवार को अधिक महत्व देने लगे।
संयुक्त परिवार में पहले जहां कई रिश्ते ताऊ-ताई, दादा-दादी, चाचा -चाची, बुआ-फूफा मामा-मामी और भी अनेको रिश्ते होते थे, सब का सुख दुख सांझा होता था। बच्चों को घर के बुज़ुर्गो और बड़ों से नैतिक शिक्षा की अमूल्य सीख मिलती थी।
Sharing is caring का भाव सीखते थे।
पर लोगों को जब संयुक्त परिवार में घुटन महसूस होने लगी तो सिर्फ़ हम और हमारे बच्चों के भाव ने एकल परिवारों को जन्म दिया जहां बच्चों के बेहतर भविष्य और परिवार की बेहतर सुविधाओं की खातिर माता-पिता अपने कार्यों में व्यस्त हो गए और बच्चे नौकरों के भरोसे पलने लगे माता-पिता और बच्चों में भी दूरियां पैदा हो गई। धीरे-धीरे बच्चों के मन में भी प्रेम और स्नेह की भावना समाप्त हो गई और समय आने पर उन्हें भी सिर्फ अपनी तरक्की और अपना भविष्य अपनी आज़ादी ही नजर आने लगी। इस तरह परिवार लगातार टूटता चला गया और बच्चों और माता-पिता में भी अनंत दूरियां पैदा हो गई।
रिश्ते सिर्फ़ नाम के लिए ही रह गए फोटो फ्रेम तक सीमित।
इस तरह हम कह सकते हैं कि इंसान की अपरिमित इच्छाएँ उसकी आजादी की चाह और नैतिक मूल्यों का विघटन ही बिखरते रिश्ते और टूटते परिवारों का मुख्य कारण है।
*बिखरते रिश्ते टूटते परिवार*
स्व से अति प्रेम और दिलों में अपरिमित रूप से उमड़ती आजादी का भाव तथा नैतिक मूल्यों का ह्रास यही रिश्तों के बिख़राव का मूल कारण है।
रिश्तों के इस बिखराव की शुरुआत बहुत पहले हो गई थी जब हम संयुक्त परिवार से एकल परिवार को अधिक महत्व देने लगे।
संयुक्त परिवार में पहले जहां कई रिश्ते ताऊ-ताई, दादा-दादी, चाचा -चाची, बुआ-फूफा मामा-मामी और भी अनेको रिश्ते होते थे, सब का सुख दुख सांझा होता था। बच्चों को घर के बुज़ुर्गो और बड़ों से नैतिक शिक्षा की अमूल्य सीख मिलती थी।
Sharing is caring का भाव सीखते थे।
पर लोगों को जब संयुक्त परिवार में घुटन महसूस होने लगी तो सिर्फ़ हम और हमारे बच्चों के भाव ने एकल परिवारों को जन्म दिया जहां बच्चों के बेहतर भविष्य और परिवार की बेहतर सुविधाओं की खातिर माता-पिता अपने कार्यों में व्यस्त हो गए और बच्चे नौकरों के भरोसे पलने लगे माता-पिता और बच्चों में भी दूरियां पैदा हो गई। धीरे-धीरे बच्चों के मन में भी प्रेम और स्नेह की भावना समाप्त हो गई और समय आने पर उन्हें भी सिर्फ अपनी तरक्की और अपना भविष्य अपनी आज़ादी ही नजर आने लगी। इस तरह परिवार लगातार टूटता चला गया और बच्चों और माता-पिता में भी अनंत दूरियां पैदा हो गई।
रिश्ते सिर्फ़ नाम के लिए ही रह गए फोटो फ्रेम तक सीमित।
इस तरह हम कह सकते हैं कि इंसान की अपरिमित इच्छाएँ उसकी आजादी की चाह और नैतिक मूल्यों का विघटन ही बिखरते रिश्ते और टूटते परिवारों का मुख्य कारण है।
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